Monday, 30 May 2016

๐ŸŒน เคฎूเคฒांเค•------9 ๐ŸŒน

🌹 मूलांक------9 🌹

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मूलांक ९ का स्वामी मंगल है. मूलांक ९ के लोग मान सम्मान और मर्यादा को ध्यान रखने वाले होते हैं. इनमें नेतृत्व का गुण होता है और भले ही ये उच्च स्थान पर हों या न हों, ऐसा ये हमशा महसूस करते हैं. जिस भी स्थान पर हों, ये हर चीज़ का ख़याल रखने वाले होते हैं. 

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मूलांक ९ के जातक मानवता में यकीन रखते हैं. ये किसी को मुसीबत में देखकर उसकी भरसक मदद करने में तत्पर रहते हैं. दूसरों के लिए अपनी ऊर्जा, समय और धन लगाने से ये कभी नहीं कतराते. 

मूलांक ९ के जातक अपने माता पिता का पूरा ख्याल रखते हैं. अपने भूतकाल से कभी भी ये विलग नहीं होते. 

आप किसी भी चीज़ का अंत नहीं करना चाहते. और अगर आप अंत भी करते हैं तो अपने शर्तों पर. 

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आपको अपनी मान मर्यादा का पूरा ख्याल रहता हैं और आप चाहते हैं की लोग आप का पूरा सम्मान करें. आप चाहे जिस भी ओहदे पर हों, इस बात का आपको हमेशा ख्याल रहता है. आप जैसे झुकना जानते ही नहीं. दूसरे ही आप का सम्मान करें. 

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मूलांक ९ के लोग हर चीज़ का ख़याल तो रखते हैं परन्तु इनके लोगों से बोलने और दूसरों को सम्मान देना सीखना चाहिए. 

दूसरों की मदद करने के चक्कर में कभी कभी आप लोग अपनी धन दौलत बर्बाद करके आर्थिक रूप से विपन्न हो जाते हैं. दूसरों की मदद ज़रूर करें, पर अपनी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखके। 

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आप में गुण तो बहुत हैं परन्तु आप किसी एक पर कभी ध्यान नहीं दे पाते. इसके वजह से आप किसी ख़ास क्षेत्र में एक्सपर्ट नहीं बन पाते। 

आपको अपने सम्मान, मान मर्यादा का पूरा ख्याल हैं, पर आप दूसरों के साथ वही व्यवहार नहीं करते. आप चाहते हैं कि दूसरे आपके आगे झुकें पर आप नहीं झुकना चाहते. याद रखें, सम्मान पाने के लिए सम्मान देना भी ज़रूरी होता है. 

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ग्रह स्वामी- मंगल

श्रेष्ठ समय- 21 मार्च से 27 अप्रैल, 21 अक्टूबर से 27 नवम्बर

श्रेष्ठ तिथियां- 9, 18, 27

श्रेष्ठ वर्ष-9, 18, 27, 36, 45, 54, 63, 72

अनुकूल तिथियां- 3, 12, 21, 30 एवं 6, 15, 24

अनुकूल वर्ष- 3, 12, 21, 30, 39, 48, 57, 66, 75 एवं 6, 15, 24, 33, 42, 51, 60, 69

निर्बल समय- मार्च, मई, जून तथा 18 नवम्बर से 31 दिसम्बर

विपरीत तिथियां- 1, 10, 19, 28

शुभ दिन- मंगलवार, गुरुवार, शुक्रवार

शुभ रंग- लाल, गुलाबी

शुभ रत्न- मूंगा

धातु- सुवर्ण

रोग- रक्तचाप, दुर्घटना, चोट, शरीरिक शिथिलता, हृदय रोग

देव- हनुमान जी

व्रत- मंगलवार

दान पदार्थ- मूंगा, स्वर्ण, गेहूं, रक्त चंदन, लाल वस्त्र, गुड़, घी, कनेर पुष्प, केशर

विवाह संबंध- 15 अक्टूबर से 14 दिसम्बर तथा 15 मई से 14 जून के मध्य जन्मे जातकों से

अनुकूल अंक- 1, 2, 3, 4, 6, 7

प्रतिकूल अंक- 5, 8

व्यवसाय- संगठन, संघ संचालन, नियंत्रण, चिकित्सा, ज्योतिष, धर्मोपदेश, सैन्य विभाग, गोला-बारूद, वकालत, औषधि कार्य, धातु कार्य आदि

अनुकूल दिशा- पूर्व, उत्तर-पूर्व

प्रतिकूल दिशा- दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम
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เคšांเคกाเคฒ เคถเคฌ्เคฆ

*चांडाल शब्द का अर्थ होता है क्रूर कर्म करनेवाला, नीच कर्म करनेवाला*

⚫राहू और केतु दोनों छाया ग्रह है. पुराणों में यह राक्षस है. पौराणिक मान्यता के अनुसार राहू और केतु के लिए  राहू राक्षस का मस्तक है तो केतु उसका धड़  ज्योतिषशास्त्र में राहू पाप। -केतु दृष्टीहीन होने के कारण उतना अशुभ नही है दोनों पाप ग्रह है.
अत: यह दोनों ग्रह जिस भाव में या जिस ग्रह के साथ हो उस भाव या उस ग्रह संबंधी अनिष्ठ फल दर्शाता है.
*यह दोनों ग्रह चांडाल जाती के है.इसलिए इनकी युति को चांडाल ( राहू-केतु ) योग कहा जाता है*

*⚫कैसे होता है चाण्डाल योग⚫*
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⚫जब कुण्डली में राहु या केतु जिस गृह के साथ बैठ जाते
है तो उसकी युति को ही चाण्डाल योग कहा जाता है ये मुख्य रूप से सात प्रकार का होता है

*▶1- रवि-चांडाल योग -*सूर्य के साथ राहू या केतु हो तो इसे रवि चांडाल योग कहते है. इस युति को सूर्य ग्रहण योग भी कहा जाता है. इस योग में जन्म
लेने वाला अत्याधिक गुस्सेवाला और जिद्दी होता है. उसे शारीरिक कष्ठ भी भुगतना पड़ता है. पिता के साथ मतभेद रहता है और
संबंध अच्छे नहीं होते. पिता की तबियत भी अच्छी नहीं रहती.

*▶2- चन्द्र-चांडाल योग -*चन्द्र के साथ राहू या केतु हो तो इसे चन्द्र चांडाल योग कहते है. इस युति को चन्द्र ग्रहण योग भी कहा जाता है. इस योग में जन्म लेने वाला शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नहीं भोग पाता. माता संबंधी भी अशुभ फल मिलता है. नास्तिक होने की भी संभावना होती है.

*▶3- भौम-चांडाल योग -* मंगल के साथ राहू या केतु हो तो इसे भौम चांडाल योग कहते है. इस युति को अंगारक योग भी कहा जाता है. इस योग में जन्म लेनेवाला अत्याधिक क्रोधी, जल्दबाज, निर्दय और गुनाखोर होता है. स्वार्थी स्वभाव, धीरज न रखनेवाला होता है. आत्महत्या या अकस्मात् की संभावना भी होती है.

*▶4- बुध-चांडाल योग -*बुध के साथ राहू या केतु हो तो इसे बुध चांडाल योग कहते है. बुद्धि और चातुर्य के ग्रह के साथ राहू-केतु होने से बुध के कारत्व को हानी पहुचती है. और जातक अधर्मी. धोखेबाज और चोरवृति वाला होता है.

*▶5- गुरु-चांडाल योग -*
गुरु के साथ राहू या केतु हो तो इसे गुरु चांडाल योग कहते है. ऐसा जातक नास्तिक, धर्मं में श्रद्धा न रखनेवाला और नहीं करने जेसे कार्य करनेवाला होता है.

*▶6- भृगु-चांडाल योग -* शुक्र के साथ राहू या केतु हो तो इसे भृगु चांडाल योग कहते है. इस योग में जन्म लेनेवाले जातक का जातीय चारित्र शंकास्पद होता है. वैवाहिक जीवन में भी काफी परेशानिया रहती है. विधुर या विधवा होने की सम्भावना भी होती है.

*▶7- शनि-चांडाल योग -* शनि के साथ राहू या केतु हो तो इसे शनि चांडाल योग कहते है. इस युति को श्रापित योग भी कहा जाता है. यह चांडाल योग भौम चांडाल योग जेसा ही अशुभ फल देता है. जातक झगढ़ाखोर, स्वार्थी और मुर्ख होता है. ऐसे जातक की वाणी और व्यव्हार में विवेक नहीं होता. यह योग अकस्मात् मृत्यु की तरफ भी इशारा करता है.

🌹अस्तु आप भी देखे कहीं आपकी कुण्डली में भी चाण्डाल योग तो नहीं है यदि हो तो इसकी शांति शमन अवश्य करे क्योंकि कहा जाता है की शान्ति का उपाय करके जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है 😊🙏🏻*
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*🔆🌹शुभ संध्या मित्रों🔆*
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เค•ुเค› เคœ्เคฏोเคคिเคท เคœ्เคžाเคจ

मित्रो आप सव को मेरा नमन मित्रो मेरी यही कोशिश है कि जो मित्र ज्योतिषसीख रहे है या जिन्हे  ज्योतिष  मे रुची है वो मेरी पोस्ट  पङ कर कुछ सिख सके पर कुछ लोगो को ईसमे भी मेरा स्वार्थ  नजर आता है उनकी जानकारी के लिऐ वता दु ना तो मेरे पास काम की कमी है ना ही संसार की किसी वस्तु  का अभाव है रव की पुरी मेहर है ओर fb  पर ईस से ज्यादा की उम्मीद  भी नहीं  रखनी चाहिऐ  ऐक कुंङली  का उदाहरन यहा दे रहा हु कानून दो प्रकार के होते है एक तो प्रकृति का कानून जिसे प्रकृति खुद बनाती बिगाडती है दूसरा इंसानी कानून जो इंसान खुद के बचाव और रक्षा के लिये बनाता है। प्रकृति का कानून सर्वोपरि है। प्रकृति को जो दंड देना है या बचाव करना वह स्वयं अपना निर्णय लेती है। अंत गति सो मति कहावत के अनुसार जीव उन कार्यों के लिये अपनी बुद्धि को बनाता चला जाता है जो उसे अंत समय मे खुद के अनुसार प्राप्त हों। कानून के अनुसार भी जीव को तीन तरह की सजाये दी जाती है पहली सजा मानसिक होती है जो व्यक्ति खुद के अन्दर ही अन्दर रहकर सोचता रहता है और वह अपने शरीर मन और दैनिक जीवन को बरबाद करता रहता है दूसरी सजा शारीरिक होती है जो प्रकृति के अनुसार गल्ती करने पर मिलती है और उस गल्ती की एवज मे अपंग हो जाना पागल हो जाना भ्रम मे आकर अपने सभी व्यक्तिगत कारको का त्याग कर देना और तीसरी सजा होती है जो हर किसी को नही मिलती है वह शारीरिक मानसिक और कार्य रूप से बन्धन मे डाल देना,इसे आज की भाषा मे जेल होना भी कहा जाता है। बन्धन योग के लिये एक बात और भी कही जाती है कि व्यक्ति अगर खुद को एक स्थान मे पैक कर लेता है या कोई सामाजिक पारिवारिक कारण सामने होता है वह अपनी इज्जत मान मर्यादा या लोगो की नजरो से बचाव के लिये अपना खुद का रास्ता एकान्त मे चुनता है तो वह भी स्वबन्धन योग की सीमा मे आजाता है। उपरोक्त कुंडली देश के एक जाने माने कलाकार और राजनीतिज्ञ की है महत्वपूर्ण व्यक्ति होने के कारण कहा जाये तो गुरु जो बारहवे भाव मे बैठ कर एक प्रकार से "खुदा महरबान तो गधा पहलवान" वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। गुरु शनि के प्रति अपनी शक्ति प्रदान करने बाद बुद्धि को प्रखर बना रहा है और वाणी के स्थान मे शनि के वक्री होने के कारण तथा वाणी के कारक बुध का भाग्य मे वक्री होने के कारण उल्टा बोलना भी एक प्रकार से इस व्यक्ति को आगे से आगे रास्ता देने के लिये माना जाता है। लगनेश राज्य भाव मे है और इनके साथ शुक्र होने के कारण एक तो राज्य की सीमा मे प्रवेश करवाते है और दूसरे एक्टिंग के क्षेत्र मे अपनी प्रसिद्धि देते है। शनि वक्री के साथ नवम पंचम का योग होने के कारण जो भी काम होते है वह बुद्धि से जुडे होते है,लेकिन एक बात और भी देखी जाती है कि चन्द्रमा जो सलाहकार के रूप मे सप्तम मे है और भाग्य का मालिक भी है कभी कभी इस व्यक्ति के साथ छल करने का काम करता है आप समझ गये होगे कि इस व्यक्ति के साथ दो बार विवाह के प्रति छल हुआ और इसी प्रकार से यह व्यक्ति भावुकता के वश मे होकर खुद को उतना आगे नही कर पाया जितना इसे किया जाना था। केतु जो इस व्यक्ति को मनोरंजन और राज्य के प्रति सर्वोच्च ऊंचाइयों मे ले जाता है वह जब पिछले समय मे सूर्य और वक्री बुध के साथ था तो देश के गणमान्य व्यक्तियों मे नाम दिया लेकिन शुक्र मंगल के साथ होने पर तथा जन्म के केतु और गोचर के केतु के बीच मे षडाष्टक योग होने के कारण और इसके द्वारा आगे प्राप्त पद के लिये अन्दरूनी दुश्मनी होने के कारण कानूनी जाल मे फ़ंसाने का क्रम भी इसी मंगल ने किया। कहा जाता है कि मंगल दो प्रकार का होता है एक नेक मंगल जो मकर राशि मे हो और खुद के निर्णय को लेने मे समर्थ हो हर काम को नेक तरीके से करता जाये और दूसरा होता है बद मंगल जिन्होने लाल किताब का अध्ययन किया है उन्हे वास्तविक रूप से पता होगा कि मंगल का बद होना तभी मुनासिब होता है जब वह शुक्र के साथ हो बुध के साथ हो या शनि राहु केतु की सीमा मे अपना दखल दे रहा हो। यह मंगल शुक्र के साथ होने से बद मंगल की श्रेणी मे आजाता है और इस मंगल के लिये उच्च भाव मे होने के बाद भी अपनी शुक्र की नीति से तकनीकी मनोरंजन के साथ साथ तकनीकी राजनीति का कारण भी पैदा कर देता है।
राहु इस मंगल के आगे होने के कारण चल कर आफ़त पालने के लिये भी माना जाता है,लेकिन कन्या राशि का होने के कारण और पंचम केतु के साथ साथ वक्री शनि से देखे जाने के कारण अचानक सहायता मे भी आजाता है और जो घटना या कारण इसके लिये एक प्रकार से समाप्त करने का कारण पैदा करती है वही घटना या कारण अक्समात बचाव करने के बाद प्रसिद्धि देने के लिये भी बन जाता है। इस राहु को मंगल और शुक्र की युति प्राप्त होने के कारण या राहु से बारहवे भाव मे मंगल शुक्र होने के कारण राहु खुद को समाप्त करने के बाद प्रसिद्धि देता है। यह बात  जब इनकी पहली पत्नी को ब्रेन ट्यूमर हुआ था और इसके बाद राहु जो जीवन साथी के रूप मे सामने आया था वह खुद को समाप्त करने के बाद इन्हे प्रसिद्धि देता चला गया। राहु अपने कनफ़्यूजन को जरूर देता है चाहे वह खुद के प्रति हो या दूसरो के प्रति हो.
यही राहु बारहवे केतु से विरोधाभास करने के बाद कभी कभी खुद को लम्बी अडचल मे भी डाल देता है,उल्टा बोलने के कारण और खुद के प्रति अधिक आत्मीय विश्वास होने के कारण यह व्यक्ति अपनी साख को कायम रखने के लिये प्रसिद्ध है,और कोई भी जेल या बन्धन इस व्यक्ति को छ: महिने से अधिक नही रख सकता है उसका कारण है कि यह राहु शुक्र मंगल से लेकर बारहवे गुरु को सहायता प्रदान कर रहा है जब बारहवा गुरु सहायता मे हो तो सहायता राहु के द्वारा ही प्राप्त हो जाती है।मित्रो ज्योतिष  मेरा पेषन भी है ओर वीजनेस भी है अगर आप कुंङली  दिखाना चाहते है तोया समस्या का हल चाहते है तो सम्पर्क  करे ऐक ओर वेनती है की मुफ्त के लिऐ मैसर्स  या फोन ना करे  

เค•ुंเคกเคฒी เคœ्เคžाเคจ 2

मित्रो आपका प्यार ओर जो मुझे मिल रहा है उसका मै वघाई  शुक्रगुजार हु मेरी भी यही कोशिश  है की ज्योतिष  सिखने वाले मित्रो को मेरी पोस्ट  से ज्ञान मिले किन्तु  कुछ लोग ईसमे मे भी मेरा स्वार्थ  ढुंढते जीवन के चतुष्कोणीय आकार मे गुरु का महत्व जीव के रूप मे देखा जाता है यह जिस भाव मे अपनी युति को प्रदान करता है वह भाव एक प्रकार से सम्पूर्ण जीवन का केन्द्र बिन्दु बन जाता है। गुरु के दो तीन प्रभाव माने जाते है एक प्रभाव मार्गी गुरु का होता है और दूसरा प्रभाव वक्री गुरु का तथा तीसरा भाव अस्त गुरु का होता है। गुरु जब कुंडली मे मार्गी होता है तो जातक के लिये अपने परिवार समाज रिस्ते नाते शिक्षा आदि के साथ संस्कृति का कारण वही बन जाता है जो उसके पैदा होने के बाद उसे बिरासत मे मिले होते है लेकिन वही गुरु अपने समाज परिवार और रीति रिवाज से दूर होकर अपने कार्य व्यवहार समझ और अपनी खुद की योग्यता से अपने भविष्य का निर्माण करने के लिये उत्तरदायी हो जाता है। गुरु का मार्गी होना एक प्रकार से बहती हवा के साथ चलना होता है और वक्री होने से बहती हवा से विरुद्ध चलने जैसा होता है। इस बात को एक प्रकार और भी समझा जा सकता है कि जो लोग लीक से हटकर चलने वाले होते है वह वक्री गुरु की श्रेणी मे आजाते है,कहा भी जाता है - "लीक छोड तीनो चलें शायर शेर सपूत",यानी लेखक और शेर के साथ सपूत को भी जोडा गया है यह तीनो ही लीक को छोड कर चलने वाले होते है।
ऐक उदाहरण  कुंङली से  कुंडली मकर लगन की है और स्वामी शनि सप्तमेश के साथ अष्टम भाव मे है। अष्टम भाव के लिये ज्योतिष मे जो विवरण मिलता है वह सबसे उत्तम विवरण जोखिम से सम्बन्धित कामो के लिये मिलता है इसके साथ ही जब शनि जो लगनेश है वह जोखिम के कामो के साथ सप्तमेश को साथ ले लेते है तो व्यक्ति के अन्दर एक प्रकार से अपनी गति विधि के प्रसारित करने के कारण जो भी इस भाव से सम्बन्धित कारक होते है वह फ़्रीज होने लगते है। जैसे कोई व्यक्ति अपने कार्य से राज्य के प्रति स्कूल के प्रति सरकारी और राजनीति से सम्बन्धित गुप्त कार्य कर रहा होता है और जातक अपनी हलचल अगर इस प्रकार के लोगो के साथ शुरु कर देता है तो लोग अक्समात चुप हो जाते है। और उस समय इतने शांत हो जाते है कि व्यक्ति को आगे चलकर अहसास भी नही होता है कि जहां उसने अपनी गतिविधि को शुरु किया है वहां कभी गलत गतिविधि भी हुआ करती थी। कुंडली का मुख्य केन्द्र बिन्दु गुरु वक्री होकर कर्जा दुश्मनी बीमारी और नौकरी के भाव मे है जातक को इन्ही क्षेत्रो के प्रति अधिक रुझान होना इनके बारे मे ज्ञान प्राप्त करना और इन्ही कारको के प्रति अपनी योग्यता को जाहिर करने का अवसर जीवन मे मिलता रहता है। इसके साथ ही जातक के लिये एक बात और भी देखी जा सकती है कि जातक को यह गुरु अपनी युति से वह सब प्रदान करता है जो एक साधारण व्यक्ति को प्रदान नही कर पाता है जैसे एक साधारण व्यक्ति अपनी रुचि से बहुत कोशिश करता है कि वह दिये गये पाठ या चलने वाली गतिविधि को याद कर ले पर वह याद नही कर पाता है और वही पर अगर गुरु वक्री वाला जातक अपनी बुद्धि को चलाने के लिये सामने आता है तो एक चौथाई समय मे ही अपनी योग्यता से होने वाली घटना किये जाने वाले काम और कठिन से कठिन विषय को याद करने मे अपने को आगे बढाता चला जाता है। यह गुरु किसी भी प्रकार के किये जाने वाले गुप्त कार्य धन से सम्बन्धित वह कार्य जो गुप्त होते है और वह सामने नही आते है उन्हे अपनी योग्यता से निकालकर बाहर ले आता है।
इस गुरु का पहला मार्ग मंगल को साथ लेकर शनि चन्द्र के साथ मिलने की योग्यता को धारण करता है,शनि गुरु के प्रभाव से शिक्षा के क्षेत्र स्थानीय रक्षा के कारण स्कूली विषयों मे रुचि रखने वाले लोग इस गुरु की शक्ति मे इजाफ़ा करते है। गुरु जो अपनी युति को उल्टे रूप मे प्रस्तुत करने वाला होता है वह बुध की मिथुन राशि मे होने के कारण लेखन क्रिया मे अपनी योग्यता को तुरत फ़ुरत ग्रहण कर लेता है इसके अलावा भी गुरु का कालपुरुष की कुंडली से कन्या राशि मे होने से जातक को नौकरी आदि के क्षेत्र मे अच्छी प्रगति देता है लेकिन अपनी गति से उल्टे रूप से धन को प्राप्त करने के लिये गुरु से आगे के मंगल को अपने सामने रखता है। जातक की कुंडली मे मंगल नीच का है और नीच के मंगल का योग लाभ भाव मे विराजमान बुध से भी है बुध भी इस कुंडली मे छठे भाव का मालिक भी है और भाग्य का कारक भी है इसलिये जातक को अपनी शक्ति से गूढ विषयों के प्रति जानकारी प्राप्त करना,लोगो के भावो को समझ कर अपने कार्यों को करना जो भी कार्य किये जाये वह एक प्रकार से ब्रोकर की हैसियत से करना और जो लोग गुप्त रूप से अपने को जमीनी कारणो से जुड कर और भूमिगत काम करने वाले होते है उनके बारे मे खुद के अनुभव से समीक्षा करने की शक्ति गुरु के अनुसार ही मिलती है। गुरु बुध के घर मे होने से बुध के प्रभाव को प्रस्तुत करने वाला है और वक्री होने के कारण अपने को बैंकिंग आदि के क्षेत्र से जोड कर भी चलता है।   नीच का मंगल सप्तम मे होने से विवाह आदि के कारणो मे क्लेश का कारण भी बनाता है मंगल पर केतु की नजर होने से जातक को एक से अधिक विवाह करने की अपनी योग्यता को भी प्रदान करता है लेकिन गुरु के वक्री होने से शादी विवाह का रूप अलावा जाति से सम्बन्धित भी हो सकता है और बुध के वृश्चिक राशि मे होने से विवाह वैधव्य आदि के कारको से भी जुडा होता है जैसे दुर्घटना आदि के कारणो से जुडे लोग और असहाय लोग जो जातक की कृपा पर आधारित होते है आदि बाते विवाह के लिये मानी जा सकती है। लगनेश शनि का सप्तमेश चन्द्रमा के साथ होने से विवाह मे देरी का कारण भी बनता है और जो भी शादी सम्बन्ध वाली बात चलती है उसके अन्दर जातक को एक प्रकार से धीरे धीरे प्रोग्रेस करने के कारण भी शादी विवाह के लिये दिक्कत मे जाना जा सकता है। चन्द्रमा के साथ होने से जो भी भावनाओ से रिस्ते आदि जोडे जाते है वह भी एक प्रकार ठंडी और सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी से अलग होने के कारण अपनी भावनाओ को कह भी नही पाते है और दूर रहकर केवल गतिविधियों पर अपनी नजर को रखते है। जातक की शादी का समय आने वाले साल दो हजार तेरह मे सात जून के आसपास मिलता है। मित्रो ज्ञान वाँटने से वङता है यही मेरा स्वार्थ  है अगर आप मुझ से अपनी किसी समस्या  का समाघान या कुंङली  की विवेचना  करना चाहते है या असली रतन चाहते है तो सम्पर्क  करे

๐ŸŒนเคตाเคธ्เคคुเคถाเคธ्เคค्เคฐ เค”เคฐ เคธीเคกिเคฏां

🌹वास्तुशास्त्र और सीडियां🌹

निर्माण अनुरूप होने पर मनुष्य को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी मिलती है | इसके लिए अपने घर का निर्माण कराते समय निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए: - 

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(1) यदि घर में पूर्व से पश्चिम की तरफ चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हों तो भवन मालिक को लोकप्रियता और यश की प्राप्ति होती है.

(2) यदि घर में उत्तर से दक्षिण की तरफ चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हों तो घर के मालिक को धन की प्राप्ति होती है.

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(3) घर की दक्षिण दीवार के सहारे सीढ़ियाँ धनदायक होती हैं.

(4) घर की सीढ़ियाँ प्रकाशमान और चौड़ी होनी चाहिए. सीढ़ियों की विषम संख्या शुभ मानी जाती है. सामान्यतः एक मंजिल पर सत्रह सीढ़ियाँ शुभ मानी जाती हैं.

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(5) घर की घुमावदार सीढ़ियाँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं. सीढ़ियों का घुमाव घड़ी की परिक्रमा-गति के अनुसार होना चाहिए.

(6) यदि घर की सीढ़ियाँ सीधी हों तो दाहिनी ओर ऊपर जाना चाहिए.

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(7) घर के मध्य भाग में भूलकर भी सीढ़ी न बनाएँ अन्यथा सकती है बड़ी हानि हो.

(8) घर के पूर्व दिशा में सीढ़ियाँ हों, तो हृदय रोग बनाती हैं.

(9) यदि घर की सीढ़ियाँ चक्राकार सर्पिल हों, तो 'ची' ऊर्जा, ऊपर की ओर प्रवाहित नहीं हो पातीं, जिससे भवन मालिक को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

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(10) घर के ईशान कोण में बनी सीढ़ी पुत्र संतान के विकास में बाधक होती है.

(11) घर के मुख्य दरवाजे के सामने बनी सीढ़ी आर्थिक अवसरों को समाप्त कर देती है.

(12) घर की सीढ़ियों के नीचे पूजाघर का निर्माण नहीं करना चाहिए.

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(13) घर को बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि मुख्य दरवाजे पर खड़े व्यक्ति को घर की सीढ़ियाँ दिखाई नहीं देना चाहिए |

वास्तुशास्त्र के इन छोटे-छोटे उपायों से आप अवश्य ही शांति का अनुभव करेंगे.

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ज्योतिषशास्त्र ने बहुत से क्षेत्रों की खोज है तथा उसके बहु आयाम है. सत्य तो यह है कि कोई नहीं जानता कि आने वाले कल क्या होगा. हम दिन-प्रतिदिन के कामकाज में परिणामों का केवल अनुमान ही लगाते रहते हैं. अनेकों बार हमारा अंदाजा सही भी निकलता है और कई बार उम्मीदों के विपरीत परिणाम आते हैं. यह उसी प्रकार से है जैसे तपती धूप में व्यक्ति स्वयं को धूप से बचाने के लिये छाता तो लगा सकता है, परन्तु सूर्य को नहीं हटा सकता है. इसलिये ज्योतिषशास्त्र पर विश्वास रखने के साथ ही हमें अपने पुरूषार्थ पर भी भरोसा रखना चाहिये.
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