🌞जिन जातको का सूर्य नीच होता है वो हमेशा ही परेशान रेहते है उनको सरकारी कामो में दिक्कत का सामना करना पड़ता है समाज में नाम ख़राब होना । काफी दिक्कतो का सामना करना पड़ता है
सूर्य उच्च है या नीच🌹
उसके लिये बच्चों के लक्षणों को पहचाने जिस भी बच्चे का सूर्य नीच होगा वो बात बात पर झूठ बोलता है उसकी हरकते गलत होती है । जेसे घर से बिना माता पिता को बताये धन निकालने और पकड़े जाने पर झूठ बोलना सूर्य नीच की निशानी है । नमकीन भोजन का ज्यादा पसन्द करना मिठा कम खाना गलत बच्चों की संगत में ज्यादा खेलना माता पिता की बात ना मानना । पढ़ाई में मन ना लगाना हमेशा काम बिगाड़ना माता पिता की या खानदान की इज्जत की परवाह ना करना । बात बात पर परिवार या बाहर वालो के खिलाफ माता पिता के कान भरते है और झगड़े करवाते है।
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🌞और जिन बच्चों के सूर्य उच्च काे होता है वो हमेशा अपने इरादे पर अटल रहते है झूठ बिलकुल नही बोलते । अपनी गलती भी स्वीकार लेते है और दृढ़ता से सबको जवाब देते है खेल कूद में भी आगे रेह्ते है हमेशा पढ़ाई में अपना मन लगाते है । गलत बच्चों की संगत से अपने आपको दूर रखते है और गलत बच्चों के बारे में माता पिता को बता देते है। यानि गलती बर्दास्त नही करते । माता पिता की इज्जत का हमेशा ख्याल रखते है । और घर के बुजुर्गो का भी सम्मान करते है ।
🌞सूर्य ख़राब हो तो बच्चे को 43 दिन तक मीठा भोजन दे हर रविवार को गुड़ गेहू या ताम्बे का दान बच्चे के हाथो से करवाये आपको अपने बच्चों की समस्याओ से झुटकरा मिल जायेगा ।
Tuesday, 1 March 2016
सूर्य उच्च है या नीच
ज्योतिष द्वारा चोरी गयी वस्तू का ज्ञान
ज्योतिष द्वारा चोरी गयी वस्तू का ज्ञान ...
कभी -कभी घरों में छोटी मोटी चोरी की घटना घट जाती है। तब एक छट -पटाहट सी रहती है ,चोर कौन हो सकता है। ज्योतिष द्वारा इसका सटीक पता प्रश्न कुंडली से लगाया जाता है।
जब भी चोरी का पता लगता है उस समय को नोट कर लीजिये। अगर किसी को जन्मकुंडली देखने का ज्ञान है तो ठीक है नहीं तो किसी भी ज्योतिष के पास समय को बता कर समस्या का समाधान किया जा सकता है।
चोरी होने की सूचना मिलते ही तुरंत प्रश्न कुंडली बनायें।
मेष या वृषभ लग्न ----पूर्व दिशा
मिथुन लग्न ----- अग्नि कोण
कर्क लग्न ---- दक्षिण
सिंह लग्न ------------ नैरित्य कोण
कन्या लग्न --------- उत्तर दिशा
तुला और वृश्चिक लग्न -- पश्चिम दिशा
धनु लग्न ------------ वायव्य कोण
मकर और कुम्भ लग्न ---उत्तर दिशा
मीन लग्न ------------इशान कोण
उपरोक्त लग्नो में खोयी वस्तु ,उसके दिखाए गए लग्नो के सामने की दिशा में गयी है।
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अब सवाल उठता है चोरी करने वाला कौन हो सकता है तो नीचे लिखे लग्नो के आधार पर पता लगाया जा सकता है।
मेष लग्न ---ब्राह्मण या सम्मानीय भद्र पुरुष
वृषभ लग्न--क्षत्रिय
मिथुन लग्न -----वेश्य
कर्क लग्न -------शुद्र या सेवक वर्ग
सिंह लग्न ------स्वजन या आत्मीय व्यक्ति
कन्या लग्न---- कुलीन स्त्री ,घर की बहू -बेटी या बहन
तुला लग्न ----पुत्र ,भाई या जमाता
वृश्चिक लग्न-- इतर जाति का व्यक्ति
धनु लग्न ---स्त्री
मकर लग्न ---वेश्य या व्यापारी
कुम्भ लग्न---चूहा
मीन लग्न----खोयी घर में ही पड़ी है कहीं ( मिस-प्लेस )
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यह सब जानने के बाद यह भी प्रश्न उठता है , जो सामान चोरी हुआ है वह मिलेगा या नहीं ? इसके लिए प्रश्न कुंडली में चंद्रमा की स्थिति देखी जाती है। यहाँ पर चंद्रमा को मालिक और सातवें भाव को चोर माना जाता है।चौथे भाव को धन -प्राप्ति की जगह और लग्न -भाव को चोरी गया सामान माना जाता है।
1) लग्न -भाव का स्वामी अगर सातवें घर या उसके स्वामी के साथ हो तो कोशिश करने पर चोरी गया धन मिल जाता है।
2)अगर लग्न -भाव का स्वामी अष्ठम में हो तो चोर खुद ही चोरी की गयी वस्तु लौटा देगा।लेकिन ग्रह अस्त होगा तो चोरी का पता चलेगा पर वस्तु नहीं मिलेगी।
3)लग्न-भाव का स्वामी दसवें घर के स्वानी के साथ है तो चोर माल सहित पकड़ा जायेगा।
4) अगर लग्नेश की दृष्टि दसवें घर के स्वामी पर नहीं पद रही हो तो चोरी गयी वस्तु नहीं मिलेगी।
5)अगर सातवें घर का स्वामी सूर्य के साथ अस्त हो तो बहुत समय बाद चोर का तो पता चल जायेगा पर वास्तु नहीं मिलेगी।
6)अगर सप्तमेश और लग्नेश साथ में हो तो चोर राज भय से डर कर खुद ही माल को दे देता है।
7)अगर सप्तमेश पर लग्नेश की दृष्टि ना पड़ रही हो तो ना चोर को लाभ लाभ होता है ना मालिक को ,माल को मध्यस्थ ही हड़प लेता है।
8)प्रश्न कुंडली में अष्ठम भाव चोर के धन रखने का स्थान होता है इसलिए अगर धन भाव का स्वामी अष्ठम में ही बैठा हो तो माल नहीं मिलेगा।और अगर धन भाव का स्वामी सप्तम में हो तो भी माल नहीं मिलता क्यूँ कि "चंद्रास्वामी चोर सप्तम " के अनुसार सप्तम भाव स्वयं चोर है।
9) धनेश अगर अष्टमेश के साथ हो तो धन मिल जाता है।
10) अगर अष्टमेश ,दशमेश के साथ हो तो राज-पुरुष चोर का पक्षपाती ही माल नहीं मिलेगा।
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अब चोरी हुई वस्तु कहाँ छिपाई गयी है इस पर विचार करते हैं।
1) लग्नेश और सप्तमेश का आपस में परिवर्तन या दोनों एक ही भाव में हो तो वस्तु घर में ही कहीं छुपी या छुपाई गयी है।
2) चंद्रमा अगर लग्न में हो तो वस्तु पूर्व दिशा में होगी और अगर सप्तम में हो तो वस्तु पश्चिम में मिलेगी।चंद्रमा अगर दशम ने हो तो दक्षिण और चतुर्थ में हो तो वस्तु उत्तर दिशा में मिलेगी।
3) अगर लग्न में अग्नितत्व राशि ( मेष ,सिंह ,धनु ) हो तो वस्तु घर के पूर्व,अग्नि -स्थान , रसोई घर में ही मिल जाती है।
4 ) लग्न में अगर पृथ्वी -तत्व राशि ( वृषभ ,कन्या ,मकर ) हो तो वस्तु दक्षिण दिशा में भूमि में दबी मिलेगी।
5 ) अगर लग्न में वायु -तत्व राशि ( मिथुन ,तुला कुम्भ ) हो तो वस्तु पश्चिम दिशा में हवा में लटकाई गयी है।
6 )लग्न में जल-तत्व राशि ( कर्क ,वृश्चिक ,कुम्भ ) हो तो वस्तु जलाशय के पास या उसके आस-पास उत्तर दिशा में मिलेगी।
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ग्रहों के हिसाब से चोर कौन है और कितनी उम्र का है ये भी पता लगाने की कोशिश करते हैं।
1) प्रश्न -कुंडली में यदि लग्न पर सूर्य-चन्द्र दोनों की दृष्टि पड़ रही हो तो वस्तु किसी घर के व्यक्ति ने ही चुराई है।और यदि लग्नेश ,सप्तमेश से युक्त हो कर लग्न में हो तो भी चोरी किसी घर के व्यक्ति ने ही की है।
2)लग्न पर सूर्य या चन्द्र किसी एक ही की दृष्टि पड़ रही हो तो वस्तु किसी आस पास रहने वाले व्यक्ति ने चुराई है।
3)अगर सप्तमेश द्वादश या तृतीय स्थान में हो तो घर के नौकर ने चोरी की है।
4 )अगर सप्तमेश स्वग्रही या अपनी उच्च राशि में हो तो चोरी पेशेवर चोर ने की है। यहाँ पर चोर की शक्ति का ज्ञान लग्न,सप्तम और दशम भाव के बल के अनुसार करना चाहिए।
5) प्रश्न -कुंडली में अगर सूर्य बलवान हो तो पिता या पितातुल्य व्यक्ति ,चंद्रमा बलि हो तो माँ या मातातुल्य महिला ,शुक्र बली हो तो महिला ,वृहस्पति बलि हो तो घर के मालिक ने ,शनि बलि हो तो पुत्र ने और मंगल बलि हो तो भाई या सगा भतीजा तथा बुध बलवान हो तो मित्र या मित्र -सम्बन्धियों ने चोरी की है।
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लग्न में अगर शुक्र ----युवक
बुध ---बालक
गुरु -----वृद्ध
मंगल--युवक
शनि -वृद्ध चोर है।
लग्न और दशम भाव के मध्य सूर्य है तो चोर बालक है। दशम भाव और सप्तम भाव के मध्य सूर्य हो तो चोर युवक है। लग्न और चतुर्थ भाव के मध्य सूर्य हो तो चोर अत्यंत वृद्ध है।
कोर्ट केस और ज्योतिष
कोर्ट केस और ज्योतिष
अक्सर मनुष्य को अपने कारणो से न्याय के लिये जाना पडता है,न्याय भी प्रकृति के अनुसार ही मिलता है,अगर किसी को न्यायालय न्याय नही दे पाता है तो प्रकृति अपने द्वारा उसे सजा देती है,लेकिन किसी प्रकार का छल या फ़रेब करने के बाद न्याय ले लिया जावे तो वह न्याय नही बेईमानी कही जाती है,प्रकृति ने न्याय के लिये जिन कारकों को नियुक्त किया है वे इस प्रकार से हैं
लगन वादी है
कुन्डली या प्रश्न कुन्डली में लगन वादी होती है और वह वाद कुन्डली में लगनेश के स्थान से पता किया जाता है,लगनेश पर कब खराब या अच्छे ग्रह फ़रक डाल रहे होते है,जो ग्रह अपने असर से खराब असर देता है वही कारण न्यायालय में जाने का होता है।
सप्तम स्थान प्रतिवादी का है
लगन से या प्रश्न कुन्डली से सप्तम स्थान प्रतिवादी का होता है,अगर सप्तमेश किसी प्रकार से शक्तिशाली होता है तो प्रतिवादी की जीत होती है,और कमजोर रहने पर वह हार जाता है और वादी की जीत हो जाती है,सप्तमेश का असर जिन जिन राशियों या ग्रहों पर होता है वहीं पर प्रतिवादी अपना खराब असर देता है।
शनि केतु दोनो मिलकर वकील बनते है
न्यायालय में जाने के लिये वकील की जरूरत पडती है,शनि और केतु अगर अगर माफ़िक है तो वकील ठीक मिलता है,और शनि केतु ठीक नही है तो वकील भी परेशान करते है।
शनि न्यायालय का रूप बताता है
जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली से शनि का स्थान देखकर ही पता किया जाता है कि न्यायालय का क्षेत्र कैसा है,उच्च न्यायालय के लिये शनि की उच्चता और नीचे के न्यायालयों के लिये शनि के निम्न भावों में स्थिति देखकर पता किया जाता है।
जज गुरु होता है
जन्म कुन्डली की या प्रश्न कुन्डली की स्थिति को देखकर पता किया जाता है कि गुरु किस भाव में है और गुरु पर किस किस ग्रह का असर जा रहा है,गुरु के ऊपर जिस ग्रह की नजर होती है जज उसी प्रकार का न्याय देता है,और गुरु जिस ग्रह को अपना असर देता ग्रह को उसी प्रकार से न्याय लिखना पडता है।
शनि बुध इतिहासिक न्याय कर्ता है
कुन्डली में अगर किसी प्रकार से शनि और बुध की युति से न्याय लिखा जाता है तो वह इतिहासिक न्याय कहा जाता है,और उस न्याय के द्वारा अन्य लोगों को न्याय देने के लिये वकील या जज उस दिये गये न्याय का हवाला अदालत में देते हैं।
न्याय मिलने की अवधि शनि तय करता है
कर्म और फ़ल का दाता शनि न्याय के समय को निश्चित करता है,राहु वादी प्रतिवादी को भ्रमित करने के बाद न्यायालय में घुमाते रहते है,और वकील के लिये कमाई का साधन राहु ही करवाता है।
राहु का कार्य दो को लडाकर दूर बैठकर तमाशा देखना है
दो व्यक्तियों को चुगली के द्वारा या अन्य कारण से राहु भ्रम में डाल देता है,उन भ्रमों के कारण दोनो एक दूसरे से पूंछे बिना ही या किसी प्रकार की राहु की हरकत से ग्रसित होकर एक दूसरे के जान के दुश्मन बन जाते है,और कोर्ट केश या थाने अदालत के चक्कर लगा लगा कर बरबाद हुआ करते है।
शनि राहु की युति और मंगल की द्रिष्टि जेलखाना है
कुन्डली में शनि राहु की युति को अगर मंगल देखता है तो जेलखाना या नजरबंदी कहा जाता है,लेकिन किसी प्रकार की गुरु या सूर्य की युति जेलखाने के भाव को बदल कर रेलगाडी या वाहन की चलती फ़िरती केटरिंग में बद्ल देते है,यह भाव किसी प्रकार से केतु की उच्चता में गाडियों की रिपेयरिंग का स्थान भी बन जाता है।
द्वितीयेश धन तृतीयेश चैक षष्ठेश बैंक है
दूसरे भाव का मालिक नगद धन का मालिक है तीसरे भाव का मालिक चैक है और छठे भाव का मालिक बैंक है,तीसरे भाव को अगर अच्छा ग्रह देख रहा है तो चैक पास हो जाता है,और अगर कोई गलत ग्रह देख रहा है तो वह चैक अनादरित हो जाता है,उसी प्रकार से दूसरे भाव का मालिक अगर कमजोर है तो बैंक में धन नही है और चैक के द्वारा गलत तरीके से भुगतान किया जा रहा है,तीसरे भाव को राहु के देखने पर झूठा चैक दिया जा रहा है।
नवें भाव का राहु प्रतिवादी को झूठ बुलवाता है
नवां भाव प्रतिवादी के लिये तीसरा भाव बन जाता है,और राहु की सिफ़्त झूठ बोलने की होती है,इसलिये प्रतिवादी के अन्दर झूठ बोलने की कला आ जाती है,लेकिन गुरु अगर राहु के साथ है तो गुरुचान्डाल योग बनने से जज को झूठी बात पर भी यकीन हो जाता है और फ़ैसले में झूठे व्यक्ति का फ़ायदा हो जाता है,लेकिन राहु के गोचर में मंगल के साथ पहुंचते ही झूठ से पर्दा उठ जाता है,तथा झूठे तरीके से जीते गये केश का असर अचानक मौत या किसी प्रकार के भयंकर हादसे के रूप में सामने आता है,अथवा झूठी बात या गवाही देने वाले के लिये किसी न मिटने वाली बीमारी के पैदा होने के कारण उसे पूरी सजा जो मिलनी थी वह मिलती है,तथा जो नुकसान झूठी बात या गवाही देने के कारण वादी को हुआ था उसे किसी अन्य मद के जरिये उसकी क्षति पूर्ति हो जाती है,यही प्रकृति का न्याय बोला है,और जज को हर फ़ैसले में Natural Law के बारे में सोचना पडता है।
64 तंत्रों के नाम
64 तंत्रों के नाम
चतु:शती में 64 तंत्रों के नाम और उनके ऊपर 'सौंदर्यलहरी टीका' में प्रदत्त लक्ष्मीधर की व्याख्या इस प्रकार है-
क्र0सं0 1-2 महामाया तंत्र और शंबर तंत्र: इसमें माया, प्रपंच, निर्माण का विवरण है। इसके प्रभाव से द्रष्टा की इंद्रियाँ तदनुरूप विषय को ग्रहण न कर अन्याथा ग्रहण करती हैं। जैसा वस्तु - जगत् में घट है यह द्रष्टा के निकट प्रतिभात होता है- फ़ पटफ़ रूप में। यह किसी न किसी अंश में वर्तमान युग में प्रचलित हिपनॉटिज्म (क्तन्र्द्रददृद्यत्द्मथ्र्) प्रभृति मोहिनी विद्या के अनुरूप है।
क्र0 सं0 3. - योगिनी जाल शंबर : मायाप्रधान तंत्र को शंबर कहा जाता है। इसमें योगिनियों का जाल दिखाई देता है। इसकी साधना करनेवाले के लिये श्मशान प्रभृति स्थानों में उपदिष्ट नियामें का अनुसरण करना पड़ता है।
तत्वशंकर- यह फ़ महेंद्र जाल विद्याफ़ है। इसके द्वारा एक तत्व को दूसरे तत्व के रूप में भासमान किया जा सकता है; जैसे पृथ्वी त्तत्व में जल त व का या जल त व में पृथ्वी तत्व का।
5-12 सिद्ध भैरव, बटुक भैरव, कंकाल भैरव, काल भैरव, कालाग्नि भैरव, योगिनी भैरव, महा भैरव तथा शक्ति भैरव (भैरवाष्टक)। इन ग्रंथों में निधि विद्या का वर्णन है और ऐहक फलदायक कापालिक मत का विवरण है। ये सब तंत्र अवैदिक हैं।
13-20 बहुरूपाष्टक, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, चामुडा, श्विदूती, (?)। ये सभी शक्ति से उद्भूत मातृका रूप हैं। इन आठ मातृकाओं के विषय में आठ तंत्र लिखे गए थे। लक्ष्मीधर के अनुसार ये सब अवैदिक हैं। इनमें आनुषंगिक रूप से श्री विद्या का प्रसंग रहने से यह वैदिक साधकों के लिये उपादेय नहीं है।
21-28 यामलाष्टक: यामला शब्द का तात्पर्य है कायासिद्ध अंबा। आठ तंत्रों में यामलासिद्धि का वर्णन मिलता है। यह भी अवैदिक तंत्र है।
16- चंद्रज्ञान: इस तंत्र में 16 विद्याओं का प्रतिपादन किया गया है। फिर भी यह कापालिक मत होने के कारण हेय है। चंद्रज्ञान नाम से वैदिक-विद्या-ग्रंथ भी है परंतु वह चतु:षष्ठी तंत्र से बाहर है।
30-मालिनी विद्या: इसमें समुद्रयान का विवरण है। यह भी अवैदिक है।
31-महासंमोहन: जाग्रत मनुष्य को सुप्त यक अचेतन करने की विद्या। यह बाल जिह्यभेद आदि उपायों से सिद्ध होता है, अत: हेय है।
32-36-वामयुप्ट तंत्र : महादेव तंत्र, वातुल तंत्र, वातुलोतर तंत्र, कामिक तंत्र, ये सब मिश्र तंत्र हैं। इनमें किसी न किसी अंश में वैदिक बातें पाई जाती हैं परंतु अधिकांश में अवैदिक हैं।
37-हृद्भेद तंत्र: और गुह्यतंत्र: इसमें गुप्त रूप से प्रकृति तंत्र का भेद वर्णित हुआ है। इस विद्या के अनुष्ठान में नाना प्रकार से हिंसादि का प्रसंग है अत: यह अवैदिक है।
40 -कलावाद: इसमें चंद्रकलाओं के प्रतिपादक विषय हैं (वात्स्यायन कृत फ़ कामसूत्रफ़ आदि ग्रंथ इसी के अंतर्गत हैं।) काम, पुरूषार्थ होने पर भीकला ग्रहण और मोक्ष दस स्थान का ग्रहण और चंद्रकला सौरभ प्रभृति का उपयोग पुरूषार्थ रूप में काम्य नहीं है। इसे छोड़कर निषिद्ध आचारों का उपदेश इस ग्रंथ में है। इसका निषिद्धांश कापालिक न होने पर भी हेय है।
41-कलासार: इसमें करर्णे के उत्कर्षसाधन का उपाय वर्णित है। इस तंत्र में वामाचार का प्राधान्य है।
142-कुंडिका मत: इसमें गुटिकासिद्धि का वर्णन है। इसमें भी वामाचार का प्राधान्य है।
43-मतोतर मत: इसमें रससिद्धि (पारा आदि, आलकेमी, ॠथ्ड़ण्ड्ढथ्र्न्र्) का विवेचन है।
144-विनयाख्यर्तत्र: तिनया एक विशेष योगिनी का नाम है। इस ग्रंथ में इस यागिनी को सिद्ध करने का उपाय बतलाया गया है। किसी किसी के मत से विनया योगिनी नहीं हैं; संभोगयक्षिणी का ही नाम विंनया है।
145-त्रोतल तंत्र:इसमें घुटिका (पान पत्र, अंजन) और पादुकासिद्धि का विवरण है।
46-त्रोतलोतर तंत्र: इसमें 64,000 यक्षिणियों के दर्शन का उपाय वर्णित है।
47-पंचामृत: पृथ्वी प्रभृति पंचभूतों का मरणभाव पिंड, अड़ में कैसे संभव हो सकता है, इसका विषय इसमें है। यह भी कापालिक ग्रंथ है।
48-52 रूपभेद, भूतडामर, कुलसार, कुलोड्डिश, कुलचूडामणि, इन पाँच तंत्रों में मंत्रादि प्रयोग से शत्रु को मारने का उपाय वर्णित है। यह भी अवैदिक ग्रंथ है।
53-57 सर्वज्ञानोतर, महाकाली मत, अअरूणोश, मदनीश, विकुंठेश्वर, ये पाँच तंत्र फ़ दिगंबरफ़ संप्रदाय के ग्रंथ हैं। यह संप्रदाय कापालिक संप्रदाय का भेद है।
58-64 पूर्व, पश्चिम, उतर, दक्षिण, निरूतर, विमल, विमलोतर और देवीमत ये फ़ छपणक संप्रदायफ़ के ग्रंथ हैं।
पूर्वाक्त सक्षिप्त विवरण से पता चलता है कि ये 64 तंत्र ही जागतिक सिद्धि अथवा फललाभ के लिये हैं। पारमार्थिक कल्याण का किसी प्रकार संधान इनमें नहीं मिल सकता। लक्ष्मीधर के मतानुसार ये सभी अवैदिक हैं। इस प्रसंग में लक्ष्मीधर ने कहा है कि परमकल्यणिक परमेश्वर ने इस प्रकार के तंत्रों की अबतारणा की, यह एक प्रश्न है। इसका समाधान करने के लिये उन्होंने कहा है कि पशुपति ने ब्राह्मणा आदि चार वर्ण और ममूर्धाभिषिक्त प्रभृति अनुलोम, प्रतिलोम सब मनुष्यों के लिये तंत्रशास्त्र की रचना की थी। इसमें भी सबका अधिकार सब तंत्रों में नहीं है। ब्राह्मण आदि तीन वर्णों का अधिकार दिया गया है।
अधिकारभेद से ही वयवस्थाभेद है। पहले जो चंद्रकला विद्या की बात कही गई है वह 'चंद्रकला विज्ञान' से भिन्न है। 'चंद्रकला विद्या' के अंतर्गत चंद्रकला, जयोत्सनावती, कुलार्णव, कुलश्री, भुवनेश्वरी, बार्हस्पत्य दुर्वासामत और (?) इन सब तंत्रों का समावेश हुआ है जिनमें तीन वर्णों का अधिकार है, परंतु त्रिवर्ण विषय में अनुष्ठान का विधान दक्षिण मार्ग से ही है। शूद्रों का भी अधिकार है परंतु उनके अनुष्ठानका विधान वाम मार्ग में है। इस विद्या में मुल मार्ग, समय मार्ग का समन्वय देख पड़ता है।
शुभागम पँचक- ये पाँच आगम समय मार्ग के अंतर्गत हैं। इनमें नाम हैं - वसिष्ठ संहिता, सनक संहिता, सनंदन संहिता, शुकसंहिता सनतकुमार संहिता। ये सब वैदिक मार्गाश्वयी है। वसिष्ठादि पाँच मुनि इस मार्ग के प्रदर्शक हैं। इसका प्रवर्तन 'समयाचार' के आधार पर हुआ था। लक्ष्मीधर का कथन है कि शंकराचार्य स्वयं समयाचार का अनुरण करते थे। शुभागम पंचक शुद्ध समय मार्ग का प्रतिपादन करते हैं। दसमें षोडश नित्याओं का प्रतिपादन मूल विद्या के अंतर्गत स्वीकार करते हुए किया गया है। इसलिये इसे 'अंग विद्या' के रूप में ग्रहण किया जाता है। परंतु चतु:षष्ठी विद्या के अंतर्भुक्त चंद्रज्ञान विद्या में षोडश लित्याओं का प्राधान्य माना गया है। इसलिये इसे 'कौलमार्ग' कहा जाता है। पहले जो स्वतंत्र तंत्र की बात कही गई है - जिसका उल्लेख 'सौंदर्यलहरी' में मिलता है- उसके विषय में भास्कर राय के 'सेतुबंध' में कहा गया है कि वह 'वामकेशतंत्र' हो सकता है। नित्याषेडशार्णव इस तंत्र के ही अंतर्भुक्त है। सौंदर्यलहरी के टीकाकार गौरीकॉत ने कहा है कि 64 तंत्र के अतिरिक्त एक मित्र है वह 'ज्ञानार्णाव' हो सकता है परंतु दूसरे संप्रदाय के मतानुसार सवतंत्र विशेषण से प्रतीत होता है कि वह 'तंत्रराज' नामक विशिष्ट तंत्र का द्योतक है।
नवचतु:षष्ठी तंत्र
तोडलतंत्र में 64 तंत्रों के नाम दिए गए हैं। इस नामसूची को आधुलिक मानना समीचीन है। सर्वानंद ने अपने 'सर्वोल्लास तंत्र' में 'तोडल तंत्र' के ये नाम दिए हैं। इस सूची की आलोचना से जान पड़ता है कि यह चतु:शती की सूची से विलक्षण है ही, 'श्रीकंठी' सूची से भी विलक्षण है। सर्वोल्लासोद्धृत ताडलतंत्र में जो सूची मिलती है वह इस प्रकार है- काली, मुंडमाला, तारा, तनर्वाण, शिवसार, वीर निदश्र्न, लतार्चन, ताउल, नील, राधा, विद्यासार, भैरव, भैरवी, सिद्धेश्वर, मातृभेद, समया, गुप्तसाधक, माया, महामाया, अक्षया, कुमारी, कुलार्णव, कालिकाकुलसर्वस्व, कालिकाकला, वाराही, योगिनी, योगिनीहृदय, सनतकूमार, त्रिपुरासार, योगिनीनिजय, मालिनी, कुक्कुट, श्रीगणेश, भूत, उड्डीश, कामधेनु, उतर, वीरभद्र, वामकेश्वर, कुलचूडाभणि, भावचूड़ामणि, ज्ञानार्णव, वरदा, तंत्रचिंतामणि, विरूणीविलास, हंसतुत्र, चिदंबरतंत्र, श्वेतवारिध, नित्या, उतरा, नारायणी, ज्ञानदीप, गौतमीय, तनरूतर, गर्जन, कुब्जिका, तत्रमुंक्तावली, बृहदश्रीक्रम, स्वतंत्रयोनि, मायाख्या।
दाशरथी तंत्र के द्वितीय अध्याय में 64 तंत्रों का नामोल्लेख पाया जाता है। यह सूची पहली से कुछ भिन्न है। इंडिया ॲफिस लाइब्रेरी, लंदन में दाशरथी तंत्र की हस्तलिखित पुस्तक (मैनुस्क्रिप्ट) है जिसका लिपिकाल 1676 शकाब्द अर्थात् 1754 ई0 है। हरिवंश में लिखा है कि श्रीकृष्ण ने 64 अद्वैततंत्रों का दुर्वासा के निकट अध्ययन किया था। (दे0 अभिनव गुप्त : के0सी0 पांडेय द्वारा प्रकाशित, पृ0 55)। ऐसी प्रसिद्धि है कि दुर्वासा ही कलियुग में अद्वैत तंत्र नामक ग्रंथ तंत्रसाहित्य के विषय में काफी सूचनाएँ देता है। इसके 41 वें अध्याय में कहा गया है कि यामल आठ प्रकार के हैं- इन आठों का मूल ब्रह्म यामल है। और यामलों में रूद्र यामल, यम यामल, स्कंद यामल, वायु यामल और इंद्र यामल क नाम मिलता है (जयद्रथ यामल के 30 वें अध्याय में; दे0- विद्यापिठ की तंत्रसूची)
इनके नाम निश्वास तंत्र में नहीं हैं, ब्रह्मयामल में हैं। यामलाष्टक के अनुसार मंगलाष्टक, चक्राष्टक, शिखाष्टक प्रभृति तंत्रों का नाम जयद्रथयामल मे दिखाई पड़ता है। उसमें सद्भाव मंगला, का नाम भी है। मंगलाष्टक में भैरव, चंद्रगर्भ, सुमंगला, सर्वमंगला, विजया, उग्रमंगला और सद्भाव मंगला के नाम हैं। चक्राष्टक में षट्चक्र का वर्णन, वर्णनाड़ी, गुह्यक, कालचक्र, सौरचक्र, प्रभृति के नाम हैं। शिखाष्टक में शौंज्यि, महाशुषमा, भैरवी, शाब्री, प्रपंचकी, मातृभेदी, रूद्रकाली प्रभृति का नाम आता है।
'जयद्रथ यामल' के 36 वें अध्याय में विद्यापीठ के तंत्रों के नाम दिए गए हैं- सर्ववीर, (समायोग) सिद्धयोगीश्वरी मत, पंचामृत, विषाद, योगिनी जाल शंबर, विद्याभेद, शिरच्छेद, महासंमोहन, महारौद्र, रूद्रयामल, विष्णुयामल, रूद्रभेद, हरियामल, स्कंद गौतमी, इत्यादि।
जयद्रथ यामल की एक पुस्तक नैपाल दरबार के ग्रंथगार में रखी हुई है। उक्त ग्रंथागार में 'पिंगलामत' की 1175 ई0 की लिखी हुई एक पुस्तक है। इसे ब्रह्मयामल का परिशिष्ट मानते हैं। इसमें जयद्रथ यामल के विषय में लिखा है।